Sunday, 18 January 2026

रंगकर्मी जयंत राभा के निर्देशन में प्रेमचंद की लड़कियाँ का मंचन

दीपा कुमारी    


नई दिल्ली, 18 जनवरी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय संस्कार रंग टोली  द्वारा आयोजित संडे क्लब के कलाकारों द्वारा कलरव थिएटर फेस्टिवल के अंतर्गत  प्रेमचंद की लड़कियाँ नाटक का शानदार मंचन किया गया। मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानियों पर आधारित यह नाटक दर्शकों के लिए सामाजिक विमर्श और कला का एक अनूठा संगम साबित हुआ।

अभिमंच सभागार में आयोजित इस नाटक के मंचन किए गए। यह नाटक प्रेमचंद की चार चुनिंदा कहानी बड़े घर की बेटी, कफन, दूध के दाम और कायर पर आधारित है। असिस्टेंट डायरेक्टर और एडाप्टेसन अमित के. कुशवाहा ने इन स्वतंत्र कहानियों को एक सूत्र में पिरोते हुए बताया कि चुनौती कहानियों के 'इमोशनल थ्रेड' को पकड़ने की थी। मंच पर एक कहानी के पात्र दूसरी कहानी के पात्र से संवाद करती है, जिससे एक डायलॉजिक रेजोनेंस या संवादात्मक प्रतिध्वनि पैदा होती है, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देती है।

युवा ऊर्जा और निर्देशन की बारीकियां निर्देशक जयंत राभा  ने किशोर आयु के युवाओं के साथ काम करते हुए एक अद्भुत प्रयोग किया है। जयंत राभा, जिन्होंने पहले द कैनवास अ फील्ड ऑफ क्रिएटिविटी के माध्यम से बच्चों के साथ काम किया है, ने यहाँ भी युवाओं की ऊर्जा को प्रेमचंद के गंभीर विषयों के साथ जोड़ा है। उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया केवल अभिनय सीखने की नहीं, बल्कि समाज की उन कड़वी सच्चाइयों को समझने लाने की थी जो आज भी गाँवों और छोटे शहरों में विद्यमान हैं। कला और संगीत का जादुई संयोजन

नाटक की सफलता में इसके तकनीकी पक्ष का बड़ा योगदान रहा। संगीत निर्देशन  मंडी हाउस द बैंड के संस्थापक और संगीतकार देवेन्द्र अहिरवार के निर्देशन में कबीर खान, खुशी खान और ज़ारा खान की आवाज़ों ने माहौल को जीवंत बनाया। सेट और प्रशिक्षण रंगकर्मी परमानंद द्वारा तैयार सेट डिज़ाइन ने दर्शकों को सीधे प्रेमचंद के कालखंड में पहुँचा दिया। वहीं, राकेश कुमार की कोरियोग्राफी और सारस कुमार की लाइट डिज़ाइन ने दृश्य भाषा को और अधिक गहरा बनाया। वेशभूषा सुप्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी सावित्री मिश्रा द्वारा डिज़ाइन की गई वेशभूषा ने पात्रों के सामाजिक परिवेश को पूरी प्रमाणिकता के साथ प्रदर्शित किया।

मंच पर प्रतिभा का प्रदर्शन नाटक में सायना खन्ना ,मान्या मल्होत्रा, यशिका, वंशिका रानी, और अनन्य सिंह, कनिष्क शर्मा ने अपने अभिनय से दर्शकों को भावुक कर दिया। पृथ्वी वर्मा ने माधव और श्रीकंठ की भूमिकाओं को कुशलता से निभाया, जबकि चैतन्य ने घीसू के चरित्र में जान फूँक दी। नाटक का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को केवल लचीलापन के प्रतीक के रूप में ही नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति के रूप में दिखाया जिनका मौन भी विद्रोह की एक आवाज़ है। पितृसत्तात्मक समाज के पाखंड, वर्ग भेद और मानवीय संवेदनाओं के पतन को यह नाटक बखूबी उजागर करता है। इस नाटक का प्रोडक्स्न नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक श्री चितरंजन त्रिपाठी, रजिस्ट्रार श्री प्रदीप कुमार मोहंती और टी.आई.ई. चीफ रिकन नगोमले के मार्गदर्शन में सफलता मिली।

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